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रेगिस्तान में मंदिर: अबू धाबी में 'पहला' हिंदू मंदिर, भारत-यूएई संबंधों का सुनहरा अध्याय

 

रेगिस्तान में मंदिर: अबू धाबी में 'पहला' हिंदू मंदिर, भारत-यूएई संबंधों का सुनहरा अध्याय


 

अरब प्रायद्वीप के गर्म रेत पर एक ऐतिहासिक क्षण अंकित हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 14 फरवरी 2024 को संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की राजधानी, अबू धाबी में BAPS स्वामीनारायण अक्षर पुरुषोत्तम मंदिर के उद्घाटन के साथ, अतीत, वर्तमान और भविष्य एक साथ जुड़ गए। आश्चर्यजनक रूप से सुंदर मंदिर, जिसे खाड़ी क्षेत्र में सबसे बड़ा माना जाता है, न केवल एक धार्मिक केंद्र है, बल्कि सांस्कृतिक और राजनीतिक महत्व का भी प्रतीक बन गया है।

एक अद्वितीय मंदिर, एक असाधारण उपलब्धि:

27 एकड़ में फैला यह परिसर एक अद्भुत वास्तुकलात्मक कृति है। जटिल मूर्तिकला, आंतरिक डिजाइन और पारंपरिक भारतीय शैली इसे आंखों के लिए एक दावत बनाती है। मंदिर मुख्य रूप से भगवान स्वामीनारायण को समर्पित है, एक 19वीं सदी के हिंदू गुरु, जिन्होंने आध्यात्मिकता और सामाजिक सुधार के संदेश का प्रचार किया। हालांकि, यह सिर्फ एक धार्मिक स्थल से कहीं अधिक है। सांस्कृतिक केंद्र, प्रदर्शनी हॉल और सामुदायिक केंद्र सहित कई सुविधाओं के साथ, यह एक ऐसा स्थान है जहां संस्कृतियां मिलती हैं, ज्ञान साझा किया जाता है और समुदाय बनते हैं।


 

भारत-यूएई संबंधों का सुनहरा अध्याय:

इस मंदिर का उद्घाटन भारत और यूएई के बीच बढ़ते संबंधों का एक प्रमुख प्रतीक है। इसका निर्माण दोनों देशों की सरकारों और समुदायों के सहयोग से हुआ था। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे ''विश्वास और सद्भाव का प्रतीक'' के रूप में वर्णित किया। यह न केवल दोनों देशों के बीच आर्थिक और कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करता है, बल्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सहिष्णुता को भी बढ़ावा देता है।

स्थानीय समुदाय के लिए मील का पत्थर:

यूएई में रहने वाले लाखों भारतीय समुदाय के लिए यह मंदिर का निर्माण किसी सपने के सच होने से कम नहीं है। यह उन्हें अपनी जड़ों से जुड़ने, अपनी संस्कृति को साझा करने और धार्मिक अनुष्ठानों को करने का एक स्थान प्रदान करता है। स्थानीय समुदाय को भी इससे काफी लाभ मिलने की उम्मीद है, क्योंकि पर्यटन, शिक्षा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान बढ़ेगा।

भविष्य की ओर एक कदम:

अबू धाबी में मंदिर का उद्घाटन सिर्फ एक धार्मिक या राजनीतिक घटना नहीं है, बल्कि यह भविष्य की एक झलक भी है। यह दिखाता है कि विभिन्न संस्कृतियां और धर्म कैसे शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व में रह सकते हैं और समृद्धि की दिशा में मिलकर काम कर सकते हैं। यह मध्य पूर्व में सहिष्णुता और धार्मिक स्वतंत्रता के लिए एक शक्तिशाली संदेश भी देता है।

 

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